
अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव है। राज्य में सियासी हलचल भी से तेज है। इस बीच पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बयान सुर्खियों में हैं। पहले उन्होंने अखिलेश यादव को क्षत्रिय बताया। इसके बाद अपने जन्मदिन उत्सव में उन्होंने क्षत्रियों का सबसे नेता राजनाथ सिंह को बताया। अघोषित तौर पर दूसरे नंबर को खुद को रख दिया। प्रतापगढ़ के रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को अपने बेटों का दोस्त बताया है। अपने जन्मोत्सव में राष्ट्रकथा के बहाने हर समाज, पक्ष, विपक्ष के लोगों के साथ बाहुबली और क्षत्रिय क्षत्रपों की मौजूदगी से अपनी ताकत का भी एहसास कराया है।
सतुआ बाबा आश्रम जाना चाहिए
सतुआ बाबा पीठ के महंत संतोष दास हैं। वही प्राइवेट जेट, डिफेंडर और पोर्शे कार वाले शौकीन बाबा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सतुआ बाबा महंत के साथ अच्छा भाव रखते हैं। संतोष दास मुख्यमंत्री के दौरे में आसपास देखे भी जाते हैं। ऐसे में भला प्रशासन क्यों न नत मस्तक हो जाएगा? हुआ भी। माघ मेले में जिलाधिकारी खुद 24 दिसंबर को बाबा के आश्रम में कोट पहनकर में रोटी सेंक आए। वायरल भी हुए। 10 जनवरी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संगम पहुंचे। मंच से बाबा की तारीफ की और कहा सबको बाबा के आश्रम जाना चाहिए। इसके बाद प्रयागराज संगम तट पर तैयारियों का जायजा लेने उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पहुंच गए। मौर्य ने डीएम साहब से कहा, वह (डीएम) बाबा के चक्कर में न पड़ें, रोटी सेकने की बजाय काम पर ध्यान दें। नसीहत दी यह भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। अब बारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की थी। बाबा संगम गए तो उन्होंने कहा कि अफसरों को भी सतुआ बाबा आश्रम जाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश पर फोकस बढ़ा दिया
दिल्ली की गद्दी चाहिए? कांग्रेस को जिंदा करना है? कुछ तो करना होगा? ये सवाल कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के हैं। प्रियंका को लग रहा है कि ‘अब न चूको चौहान’ वाला समय आ गया है। उन्होंने अपनी मंशा को भाई राहुल गांधी से शेयर किया है। चाहती हैं कि पार्टी का अध्यक्ष दमदार चेहरा बने। सत्ता पक्ष से जोरदार विपक्ष की लड़ाई हो और 2029 में सब ठीक हो। बताते हैं राहुल ने प्रियंका को सुना है। सोनिया गांधी से चर्चा के बाद कांग्रेस कुछ बदलेगी। फिलहाल कांग्रेस महासचिव ने असम और इसके साथ-साथ उत्तर प्रदेश पर फोकस बढ़ा दिया है। दीदी जोरदार लड़ाई लड़ रहे हैं। अपने अंदाज में हैं। अपने एक-एक सिपहसालार पर नजर रख रही हैं। डैमेज कंट्रोल के विकल्प भी उनके पास तैयार हैं। दरअसल दीदी को पता है कि चुनाव आचार संहिता लगते ही इस बार लड़ाई तगड़ी होने वाली है। टीएमसी के रणनीतिकारों को लग रहा है कि आचार संहिता लगते ही कई नेता भाजपा में जा सकते हैं। ऐसा हुआ तो तृणमूल को झटका लगेगा। बंगाली और अन्य हिन्दू इस बार बांग्लादेश के डेवलपमेंट से तंग है। इसलिए ममता तृणमूल के जमीनी कॉडर को खास संदेश दे रही हैं। निबटना है तो तृममूल की गर्मी और भाजपा की स्टाइल अपना लो। देखना है आगे क्या होता है?