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सरिता साहनी
नई दिल्ली | 12 मई 2026

“आम आदमी” की बात, लेकिन Arvind Kejriwal की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकार बेहाल
देश में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकार दिन-रात मेहनत करके नेताओं की बातें जनता तक पहुंचाते हैं, सरकारों से सवाल पूछते हैं और सत्ता को आईना दिखाने का काम करते हैं। लेकिन जब वही पत्रकार किसी राजनीतिक कार्यक्रम में सम्मान के बजाय अव्यवस्था, असुविधा और अपमान का सामना करें, तो सवाल केवल व्यवस्था पर नहीं बल्कि राजनीतिक सोच पर भी उठते हैं। राजधानी दिल्ली में आयोजित Arvind Kejriwal की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछ ऐसी ही तस्वीर देखने को मिली, जिसने “आम आदमी” की राजनीति के दावों पर नई बहस छेड़ दी।

मंच पर शानदार व्यवस्था, पत्रकारों के हिस्से में अपमान
Arvind Kejriwal की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंच पूरी तरह व्यवस्थित दिखाई दिया। नेताओं के लिए आरामदायक व्यवस्था, सुरक्षा और विशेष इंतज़ाम मौजूद थे। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कवरेज करने पहुंचे पत्रकारों के लिए एक भी कुर्सी नहीं लगाई गई थी। कई पत्रकार घंटों तक खड़े रहकर कवरेज करते रहे, जबकि कुछ को मजबूरी में ज़मीन पर बैठना पड़ा। कैमरे, मोबाइल, ट्राइपॉड और अन्य उपकरण संभालते हुए पत्रकार लगातार भीड़ में जगह बनाने की कोशिश करते दिखाई दिए। कई पत्रकारों का कहना था कि यह केवल असुविधा नहीं बल्कि पत्रकारों का अपमान था। सवाल यह उठता है कि जो पत्रकार हर दिन Arvind Kejriwal और उनकी पार्टी की आवाज़ जनता तक पहुंचाते हैं, क्या उनके लिए बैठने की सामान्य व्यवस्था करना भी जरूरी नहीं समझा गया?

“आम आदमी” की राजनीति या सिर्फ नारेबाज़ी?
Arvind Kejriwal और आम आदमी पार्टी लंबे समय से खुद को सादगी और आम जनता की राजनीति करने वाली पार्टी बताते रहे हैं। लेकिन Arvind Kejriwal की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की तस्वीर कई सवाल छोड़ गई। लोगों का कहना है कि यदि बड़े राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं, तो मीडिया के लिए बुनियादी व्यवस्था करना भी मुश्किल नहीं होना चाहिए। क्योंकि प्रेस कॉन्फ्रेंस केवल बयान देने का मंच नहीं होती, बल्कि वह किसी राजनीतिक दल की कार्यशैली और सोच को भी दिखाती है। Arvind Kejriwal की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिस तरह पत्रकारों को नीचे बैठना पड़ा, उसने सोशल मीडिया पर भी बहस छेड़ दी।

भीषण गर्मी में जलपान तक के लिए परेशानी
दिल्ली की गर्मी और उमस के बीच पत्रकार लगातार कवरेज करते रहे, लेकिन Arvind Kejriwal की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जलपान की पर्याप्त व्यवस्था भी नजर नहीं आई। कई मीडिया कर्मियों को बाहर जाकर खुद व्यवस्था करनी पड़ी। घंटों तक खड़े रहकर काम करने वाले कैमरामैन और रिपोर्टर लगातार पसीने में काम करते रहे। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या राजनीतिक दल मीडिया को सिर्फ भीड़ बढ़ाने और कवरेज के लिए बुलाते हैं, या उनके काम करने की स्थिति को लेकर भी गंभीर हैं?

महिला पत्रकारों को भी झेलनी पड़ी अव्यवस्था
Arvind Kejriwal की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद महिला पत्रकारों को भी भीड़ और सीमित जगह के बीच काम करना पड़ा। लगातार धक्का-मुक्की और अव्यवस्थित माहौल ने कवरेज को मुश्किल बना दिया। आज जब Arvind Kejriwal और उनकी पार्टी महिला सम्मान और सुरक्षा की बातें करती है, तब ऐसे आयोजनों में महिला पत्रकारों के लिए अलग और व्यवस्थित स्थान की उम्मीद स्वाभाविक मानी जाती है। लेकिन यहां स्थिति बिल्कुल अलग नजर आई।

छोटे और डिजिटल पत्रकार सबसे ज्यादा प्रभावित
आज के दौर में डिजिटल मीडिया तेजी से बढ़ रहा है। छोटे यूट्यूब चैनल, स्वतंत्र पत्रकार और डिजिटल रिपोर्टर भी लगातार राजनीतिक खबरें जनता तक पहुंचा रहे हैं। लेकिन Arvind Kejriwal की प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसे आयोजनों में सबसे ज्यादा परेशानी इन्हीं पत्रकारों को झेलनी पड़ती है। बड़े मीडिया संस्थानों को किसी तरह आगे जगह मिल जाती है, जबकि छोटे पत्रकार पीछे खड़े होकर या नीचे बैठकर कवरेज करने को मजबूर हो जाते हैं। कई पत्रकारों का कहना था कि कार्यक्रम में छोटे मीडिया प्लेटफॉर्म्स को गंभीरता से नहीं लिया गया।

“हर बार Arvind Kejriwal की प्रेस कॉन्फ्रेंस में नीचे बैठना पड़ता है”
कार्यक्रम में मौजूद कुछ पत्रकारों से बातचीत करने पर उन्होंने नाराज़गी जाहिर की। कई पत्रकारों ने कहा कि जब भी Arvind Kejriwal की प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, उन्हें अक्सर नीचे ही बैठना पड़ता है। एक डिजिटल पत्रकार ने कहा, “हर बार यही स्थिति रहती है। बड़े चैनलों को आगे जगह मिल जाती है, लेकिन छोटे और डिजिटल पत्रकारों को नीचे बैठकर कवरेज करनी पड़ती है। ऐसा लगता है जैसे हमारे काम को गंभीरता से लिया ही नहीं जाता।” कुछ पत्रकारों ने यह भी आरोप लगाया कि Arvind Kejriwal की प्रेस कॉन्फ्रेंस में व्यवस्था इस तरह बनाई जाती है कि कुछ चुनिंदा लोगों को ही प्राथमिकता मिले, जबकि बाकी पत्रकार भीड़ में संघर्ष करते रह जाते हैं।

खुद को “सुपीरियर” समझने वाली राजनीति?
Arvind Kejriwal की राजनीति हमेशा आम आदमी के नाम पर की जाती रही है। लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस की तस्वीर ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या राजनीतिक नेतृत्व खुद को आम पत्रकारों से “सुपीरियर” समझने लगा है? जब मंच पर नेता आरामदायक कुर्सियों पर बैठे हों और नीचे पत्रकार जमीन पर बैठकर कवरेज करने को मजबूर हों, तो यह तस्वीर केवल अव्यवस्था नहीं बल्कि मानसिकता को भी दिखाती है।लोकतंत्र में मीडिया और नेताओं का रिश्ता बराबरी और सम्मान का होना चाहिए, न कि ऊंच-नीच का।

लोकतंत्र में मीडिया का सम्मान केवल भाषणों से नहीं होता
Arvind Kejriwal और अन्य राजनीतिक दल अक्सर मीडिया की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की मजबूती की बातें करते हैं। लेकिन असली सम्मान व्यवहार और व्यवस्थाओं में दिखाई देता है। पत्रकार केवल कैमरा लेकर खड़ा व्यक्ति नहीं होता। वही जनता और सत्ता के बीच पुल बनता है। वही सवाल पूछता है और वही जनता की आवाज़ को सामने लाता है। अगर पत्रकारों को हर कार्यक्रम में अव्यवस्था और अपमान झेलना पड़े, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की अच्छी तस्वीर नहीं मानी जा सकती।

“शीशमहल” बनाम ज़मीन पर बैठा मीडिया
दिल्ली की राजनीति में “शीशमहल” शब्द पिछले काफी समय से चर्चा में रहा है। विपक्ष लगातार Arvind Kejriwal और उनकी कथित आलीशान राजनीति पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में जब मंच पर नेता आरामदायक व्यवस्था में दिखाई दें और नीचे पत्रकार बिना कुर्सियों के ज़मीन पर बैठकर कवरेज करते नजर आएं, तो यह तस्वीर राजनीतिक विरोधाभास को और गहरा कर देती है।

सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने Arvind Kejriwal की प्रेस कॉन्फ्रेंस की इस व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा कि जो दल “आम आदमी” की राजनीति की बात करते हैं, उन्हें सबसे पहले उन पत्रकारों के सम्मान का ध्यान रखना चाहिए जो उनकी बात जनता तक पहुंचाते हैं।

यह सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, मीडिया सम्मान की परीक्षा थी
Arvind Kejriwal की यह प्रेस कॉन्फ्रेंस केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि यह मीडिया सम्मान की परीक्षा बन गई। पत्रकारों के लिए कुर्सियां, जलपान, भीड़ नियंत्रण और सम्मानजनक माहौल जैसी सुविधाएं कोई बड़ी मांग नहीं हैं। यह किसी भी आयोजन की सामान्य जिम्मेदारी मानी जाती है। अगर लोकतंत्र को मजबूत रखना है, तो पत्रकारों को केवल कवरेज का माध्यम नहीं बल्कि लोकतंत्र का अहम हिस्सा समझना होगा।

आखिर कब बदलेगी तस्वीर?
दिल्ली में लगभग हर दिन राजनीतिक प्रेस कॉन्फ्रेंस होती हैं। हर दल मीडिया को बुलाता है, बयान देता है और जनता तक अपनी बात पहुंचाना चाहता है। लेकिन सवाल अब भी वही है — क्या पत्रकारों की बुनियादी परेशानियां कभी किसी की प्राथमिकता बनेंगी? Arvind Kejriwal की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि लोकतंत्र की बात करने वाले राजनीतिक दलों को सबसे पहले लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का सम्मान करना सीखना होगा। क्योंकि पत्रकार केवल खबर नहीं दिखाते, बल्कि लोकतंत्र को ज़िंदा रखने का काम करते हैं।

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