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तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने केंद्र सरकार पर हिंदी और संस्कृत को थोपने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि राज्य अपनी भाषा औरसंस्कृति की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और हिंदी को जबरन लागू करने की अनुमति नहीं देगा।

हिंदी थोपने का विरोध
स्टालिन ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को लिखे पत्र में स्पष्ट किया कि हिंदी थोपने के प्रयासों का पुरजोर विरोध किया जाएगा। उन्होंने कहा कि हिंदीकेवल एक मुखौटा है, जबकि संस्कृत इसके पीछे छिपी हुई असली रणनीति है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर आपत्ति
डीएमके सरकार ने केंद्र की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में तीन-भाषा फॉर्मूले को हिंदी थोपने का जरिया बताया है। हालांकि, केंद्र सरकार इस आरोपको खारिज कर चुकी है। यह विवाद 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन की याद दिलाता है, जब डीएमके ने हिंदी के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया था।

उत्तर भारतीय भाषाओं पर हिंदी के प्रभाव का आरोप
स्टालिन ने दावा किया कि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बोली जाने वाली कई भाषाएं, जैसे मैथिली, ब्रजभाषा, बुंदेलखंडी और अवधी, हिंदीके आधिपत्य के कारण कमजोर हो गई हैं। उन्होंने कहा कि द्रविड़ आंदोलन के प्रयासों से तमिल भाषा और संस्कृति की रक्षा संभव हो सकी है।

शिक्षा नीति के माध्यम से हिंदी और संस्कृत थोपने का आरोप
मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विरोध करते हुए कहा कि इसके जरिए हिंदी और संस्कृत को प्रमुखता देने की कोशिश की जा रही है। उन्होंनेआरोप लगाया कि भाजपा शासित राज्यों में संस्कृत को बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि अन्य भाषाओं की उपेक्षा की जा रही है।

त्रिभाषा नीति को लेकर चिंता
स्टालिन ने कहा कि यदि तमिलनाडु त्रिभाषा नीति को स्वीकार करता है, तो इससे मातृभाषा को नजरअंदाज कर दिया जाएगा और भविष्य में संस्कृतको बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि एनईपी के प्रावधानों में अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में संस्कृत को प्राथमिकता दी गई है, जिससे क्षेत्रीयभाषाओं को नुकसान हो सकता है।

तमिल संस्कृति की रक्षा का संकल्प
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु में केवल दो-भाषा नीति ही लागू रहेगी, जिसे पूर्व मुख्यमंत्री सी. एन. अन्नादुरई ने लागू किया था। उन्होंने आरोपलगाया कि केंद्र सरकार तमिल भाषा को खत्म कर संस्कृत थोपने की योजना बना रही है, लेकिन उनकी सरकार ऐसा नहीं होने देगी।

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