सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पेगासस जासूसी मामले में दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए तकनीकी समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने सेइनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि इस रिपोर्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की संप्रभुता से जुड़ी संवेदनशील जानकारियाँ हैं, जिन्हें सार्वजनिक मंचपर लाना उचित नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, ऐसी जानकारी का सार्वजनिक खुलासा देश की सुरक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुँचा सकता है औरयह कदम न्यायोचित नहीं होगा। इस रिपोर्ट को लेकर अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसके कुछ हिस्सों को ही सीमित रूप में साझा किया जासकता है, लेकिन पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जा सकती।
पेगासस विवाद वर्ष 2021 में सामने आया था जब एक अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता परियोजना ‘पेगासस प्रोजेक्ट’ के तहत यह खुलासा हुआ कि भारतसहित कई देशों में पेगासस स्पायवेयर का उपयोग पत्रकारों, राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य प्रमुख व्यक्तियों की जासूसी केलिए किया गया। यह स्पायवेयर इज़राइली कंपनी एनएसओ ग्रुप द्वारा विकसित किया गया है और यह मोबाइल फोन में गुप्त रूप से घुसकर कॉल, मैसेज, लोकेशन और अन्य निजी जानकारी तक पहुंच बना सकता है। इस खुलासे के बाद भारत में काफी हंगामा हुआ और कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्टमें दायर की गईं, जिनमें सरकार से जवाब और जांच की मांग की गई।
इन याचिकाओं के जवाब में अक्टूबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने एक स्वतंत्र तकनीकी समिति का गठन किया, जिसे 29 मोबाइल फोनों की जांच काजिम्मा सौंपा गया। समिति ने 2022 में अपनी रिपोर्ट में बताया कि पांच डिवाइसेज़ में ‘मैलवेयर’ जरूर पाया गया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो सका किवह पेगासस ही था। इसके अलावा, समिति ने यह भी उल्लेख किया कि केंद्र सरकार ने जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं किया।
इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने को लेकर विपक्षी दलों ने लगातार दबाव बनाया है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया कि मोदीसरकार ने राजनीतिक विरोधियों और पत्रकारों की निगरानी कर लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन किया है। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर‘देशद्रोह’ का आरोप लगाया और गृह मंत्री अमित शाह से इस्तीफे की मांग की। वहीं सरकार ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि कोई भीनिगरानी कानून के तहत और राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में की गई होगी।
पेगासस विवाद ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर भी हलचल मचा दी थी। फ्रांस, मैक्सिको, हंगरी और इज़राइल सहित कई देशों में भी इसस्पायवेयर के दुरुपयोग के आरोप लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई कि ऐसे सॉफ्टवेयर का प्रयोग नागरिक स्वतंत्रता औरगोपनीयता के अधिकारों पर हमला है। इस मामले में संयुक्त राष्ट्र समेत कई संस्थाओं ने भी पारदर्शी जांच की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से देखा जा सकता है, लेकिन यह भी सच है कि इससे पारदर्शिता और सरकार की जवाबदेही कोलेकर जनता में शंका उत्पन्न होती है। पेगासस प्रकरण ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि तकनीक के इस युग में नागरिकों की निजता औरसुरक्षा के बीच संतुलन कैसे साधा जाए। अदालत के इस निर्णय के बाद भी पेगासस से जुड़ा विवाद थमा नहीं है और यह मुद्दा राजनीतिक औरसामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है।