दिल्ली के कालकाजी क्षेत्र में स्थित भूमिहीन कैंप में बीते कुछ दिनों से चल रही घटनाओं ने दिल्ली की राजनीति में हलचल मचा दी है। वर्षों से इसइलाके में रह रहे सैकड़ों परिवारों को बेदखल करने की तैयारी प्रशासन द्वारा की जा रही है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे 20 से 40 वर्षों सेयहां रह रहे हैं, उनके बच्चे यहीं स्कूल जाते हैं, वे यहीं मेहनत-मजदूरी कर जीवन चला रहे हैं। लेकिन अब बिना वैकल्पिक व्यवस्था के उन्हें हटाया जारहा है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नेता रेखा गुप्ता ने हाल ही में दावा किया था कि “कोई भी झुग्गी टूटी नहीं है, और टूटेगी भी नहीं।” लेकिन महज 48 घंटे के भीतर ही इस बयान की सच्चाई सामने आ गई। स्थानीय लोगों का आरोप है कि दिल्ली पुलिस और डीडीए ने मिलकर एक योजनाबद्ध ढंग सेझुग्गियों को घेर लिया और लोगों को जबरन बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी। बीजेपी नेताओं का तर्क है कि वे कोर्ट के आदेश का पालन कररहे हैं। लेकिन स्थानीय निवासियों का दावा है कि जब उन्होंने कोर्ट में घर देने की मांग की तो सरकार ने खुद फ्लैट आवंटन का विरोध किया। कोर्ट नेइस आधार पर आदेश दिया कि इन बस्तियों को हटाया जाए। सवाल यह उठता है कि जब सरकार खुद कोर्ट में कहती है कि वह मकान नहीं दे सकती, तो फिर गरीबों को कहां बसाया जाएगा? सरकार द्वारा 1862 फ्लैट आवंटित किए गए, लेकिन वहां रह रहे हजारों लोगों में से अधिकतर को मकाननहीं मिला। वहीं से कुछ ही दूरी पर टीडीएस के बनाए 324 फ्लैट खाली पड़े हैं, जिन्हें इन लोगों को दिया जा सकता था। बीजेपी ने चुनावी वादों मेंकहा था कि झुग्गी में रहने वालों को उसी जगह पर मकान दिया जाएगा, लेकिन आज वह वादा सिर्फ जुमला बनकर रह गया।
महिलाओं और बच्चों के साथ पुलिस की सख्ती- विरोध करने पर महिलाओं के साथ धक्का-मुक्की और लाठीचार्ज जैसी घटनाएं सामने आईं। कईमहिलाओं ने आरोप लगाया कि पुरुष पुलिसकर्मियों ने भी महिलाओं से दुर्व्यवहार किया। एक महिला, सीता देवी, ने बताया कि उनकी साथी महिलाकी पीठ पर लाठी मारी गई जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गई। घटनास्थल पर जब विपक्षी नेता और विधायक पहुंचे, तो उन्हें मिलने से भी रोकागया। महिला नेताओं के साथ भी दुर्व्यवहार हुआ। डीसीपी साउथ और अन्य अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने लोकतंत्र की गरिमा का उल्लंघनकिया और जनता की आवाज को दबाने का प्रयास किया।
दिल्ली में इस तरह से बसी झुग्गियों को उजाड़ना केवल एक प्रशासनिक कार्यवाही नहीं है, बल्कि यह एक मानवीय संकट है। यह घटना दर्शाती है किकिस तरह सत्ता और सिस्टम मिलकर गरीबों की आवाज को दबा रहे हैं। सरकार को चाहिए कि वह केवल कोर्ट के आदेशों की आड़ में कार्रवाई करनेकी बजाय, वैकल्पिक आवास, पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन की गारंटी दे। वरना यह मुद्दा केवल कालकाजी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दिल्लीकी आत्मा को झकझोर कर रख देगा