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आम आदमी पार्टी ने भाजपा सरकार के स्कूल फीस नियंत्रण विधेयक को बताया शिक्षा माफिया को खुली छूट देने वाला कानून दिल्ली में शिक्षाव्यवस्था को लेकर आम आदमी पार्टी ने भाजपा सरकार पर बड़ा हमला बोला है। ‘आप’ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने कहा है कि भाजपासरकार जो नया स्कूल फीस नियंत्रण कानून ला रही है, वह सीधे-सीधे निजी स्कूलों और शिक्षा माफिया को लाभ पहुंचाने वाला है। इससे दिल्ली केलाखों अभिभावकों की जेब पर सीधा असर पड़ेगा।

नया कानून शिक्षा माफिया के पक्ष में
सौरभ भारद्वाज ने पार्टी मुख्यालय में प्रेसवार्ता कर बताया कि भाजपा सरकार का यह नया कानून आम लोगों की नहीं, बल्कि निजी स्कूल संचालकोंकी मदद के लिए बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी की पहले से जताई गई आशंकाएं अब सच होती दिखाई दे रही हैं।

ऑडिट की व्यवस्था खत्म, शिकायत करना हुआ मुश्किल
उन्होंने बताया कि अब तक यदि किसी एक अभिभावक को भी लगता था कि स्कूल ने फीस गलत तरीके से बढ़ाई है, तो वह शिक्षा निदेशक के पासशिकायत कर सकता था। लेकिन नए कानून में यह प्रावधान खत्म कर दिया गया है। अब शिकायत करने के लिए कम से कम 15 प्रतिशतअभिभावकों की सहमति जरूरी होगी। यानी अगर किसी स्कूल में 3000 छात्र हैं तो 450 अभिभावकों को एक साथ शिकायत करनी होगी। उन्होंनेसवाल किया कि आखिर इतने अभिभावकों को कौन ढूंढेगा?

फीस निर्धारण समिति भी स्कूल के पक्ष में
नए कानून के अनुसार, फीस बढ़ाने का निर्णय एक 10 सदस्यीय समिति द्वारा किया जाएगा, जिसमें से 5 सदस्य स्कूल के होंगे और शेष 5 सदस्य भीलॉटरी के माध्यम से स्कूल द्वारा ही चुने जाएंगे। सौरभ भारद्वाज ने कहा कि ऐसे में यह समिति पूरी तरह स्कूल के कब्जे में होगी और फीस बढ़ाने कीखुली छूट देगी।

भाजपा सरकार ने खोखले दावे किए
सौरभ भारद्वाज ने कहा कि फरवरी में जब भाजपा की सरकार बनी, तभी से निजी स्कूलों ने मनमाने तरीके से फीस में भारी बढ़ोतरी शुरू कर दी थी। कुछस्कूलों ने तो 80-82 प्रतिशत तक फीस बढ़ा दी। इस पर जब अभिभावकों ने विरोध किया तो उन्हें परेशान किया गया, बच्चों को कक्षा में नहीं बैठनेदिया गया, और बाउंसर लगाकर डराया गया।

सरकार का दोहरा रवैया उजागर
उन्होंने कहा कि पहले भाजपा सरकार ने दावा किया था कि उन्होंने सभी निजी स्कूलों का ऑडिट कराया है और इसकी जानकारी सार्वजनिक कीजाएगी। लेकिन चार महीने बीत जाने के बाद भी वह ऑडिट सार्वजनिक नहीं किया गया है। अब जब कानून लाने की बात आई तो न तो जनता से रायली गई और न ही ऑडिट की कोई व्यवस्था नए कानून में रखी गई।

पुराने प्रावधानों को हटाया गया
1973 के कानून के अनुसार, जिन स्कूलों को सरकार से जमीन मिली थी, उन्हें फीस बढ़ाने से पहले शिक्षा निदेशक से अनुमति लेनी होती थी। लेकिननए कानून में यह प्रावधान भी खत्म कर दिया गया है। इसका साफ मतलब है कि अब वह स्कूल जिन्हें सरकार से एक रुपये में करोड़ों की जमीन मिली, वो भी मनमर्जी से फीस बढ़ा सकेंगे।

सौरभ भारद्वाज ने पूछे कड़े सवाल
उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और शिक्षा मंत्री आशीष सूद से सवाल करते हुए पूछा अप्रैल में जिन स्कूलों ने मनमाने तरीके से फीस बढ़ाई, क्या यह कानून उन स्कूलों से बढ़ी हुई फीस वापस दिलवाएगा?

इस कानून में प्रत्येक वर्ष के ऑडिट की व्यवस्था क्यों नहीं रखी गई?
शिकायत करने के लिए 15 प्रतिशत अभिभावकों की बाध्यता क्यों रखी गई है? आम आदमी पार्टी का कहना है कि यह कानून शिक्षा के अधिकार परकुठाराघात है और यह अभिभावकों की आवाज को दबाने की साजिश है। अब न तो कोई पारदर्शिता रहेगी और न ही किसी प्रकार की जवाबदेही।आम आदमी पार्टी ने मांग की है कि इस कानून को वापस लिया जाए और सभी निजी स्कूलों का वार्षिक ऑडिट अनिवार्य रूप से कराया जाए।


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