
देशभर में आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों पर गंभीर सवाल उठाते हुए ऑल इंडिया आदिवासी कांग्रेस के चेयरमैन डॉ. विक्रांत भूरिया ने कहा कि सरकारकी जल्दबाज़ी और योजनाओं की खामियों का सबसे बड़ा शिकार आदिवासी बन रहे हैं। उन्होंने SIR प्रक्रिया को आदिवासियों को सिस्टम से बाहरकरने की सोची-समझी रणनीति बताया।
SIR की जल्दबाज़ी से आदिवासियों को सबसे अधिक नुकसान
डॉ. भूरिया ने कहा कि इस बार SIR यानी स्पेशल समरी रिविज़न की पूरी प्रक्रिया इतनी तेज़ी और जल्दबाज़ी में की गई कि आदिवासी समाज कोसबसे ज्यादा चोट पहुंची है। SIR को ऐसे समय में लागू किया गया जब आदिवासी समुदाय का बड़ा हिस्सा घरों पर मौजूद ही नहीं था और रोज़गारकी तलाश में राज्यों के बाहर या दूर-दराज़ इलाकों में पलायन पर था। उनके अनुसार, सरकार को मालूम था कि आदिवासी समुदाय की उपस्थितिगांवों में कम है, फिर भी प्रक्रिया को उसी अवधि में लागू किया गया ताकि अधिक से अधिक आदिवासियों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा सकें।उन्होंने कहा कि SIR का समय और गति दोनों दर्शाते हैं कि यह केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक गणित था जिसमें आदिवासीसमाज को धीरे-धीरे वोटिंग अधिकार से बाहर किया जा रहा है।
पलायन से खाली गांवों को बनाया गया बहाना
डॉ. भूरिया ने बताया कि जिन इलाकों में SIR की प्रक्रिया चलाई गई, वहाँ स्थिति बेहद चिंताजनक है। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में 70% से भी ज्यादागांव खाली पड़े हैं। रोजगार, मेहनत-मजदूरी और जीवनयापन के लिए आदिवासी बड़ी संख्या में अपने मूल गांव छोड़ देते हैं। ऐसे में SIR की प्रक्रियामें न तो वे अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाए और न ही अपने नाम सूची में बने रहने की पुष्टि कर सके। कई घरों में केवल बुजुर्ग महिलाएं या छोटे बच्चेमौजूद थे, जिन्हें न प्रक्रिया की जानकारी थी, न यह समझ कि क्या करना है। भूरिया ने कहा कि इस हालात का फायदा उठाकर अनेक जगहों परआदिवासियों के नाम सीधे काट दिए गए, आपत्तियाँ दर्ज नहीं की गईं और उन्हें वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया।
आदिवासियों को वोटिंग प्रक्रिया से बाहर करने की सिस्टमैटिक कोशिश
डॉ. भूरिया ने आरोप लगाया कि यह संयोग नहीं, बल्कि एक सिस्टमैटिक रणनीति है। SIR की प्रक्रिया को ऐसे समय में लागू किया गया जबआदिवासी समुदाय घर पर नहीं था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि एक राजनीतिक उद्देश्य के तहत उन्हें चुनावी प्रक्रिया से बाहर किया जा रहा है। उन्होंनेकहा कि यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि एक सोची-समझी साजिश है, जिससे आदिवासियों की राजनीतिक भागीदारी कमजोर हो और उनकालोकतांत्रिक अधिकार खत्म हो जाए। उनके शब्दों में यह साधारण गलती नहीं, बल्कि आदिवासियों को व्यवस्थित तरीके से वोट देने का अधिकार सेदूर करने की साजिश है।
BLO पर बढ़ा दबाव, कई जगह तनाव की स्थिति
SIR प्रक्रिया में BLO की भूमिका और हालात पर भी उन्होंने चिंता जताई। उन्होंने बताया कि कई BLO बिना सही प्रशिक्षण के इस प्रक्रिया में लगादिए गए, उन पर अत्यधिक काम का दबाव डाला जा रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों में उन्हें बड़े विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है। कुछ क्षेत्रों मेंअत्यधिक तनाव और दबाव के कारण BLO के आत्महत्या जैसे दर्दनाक मामले भी सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रशासनिक कुप्रबंधन काभयावह परिणाम है, जिसे सरकार छिपाने की कोशिश कर रही है।
आदिवासियों के अधिकार और अस्तित्व पर गंभीर हमला
डॉ. विक्रांत भूरिया के अनुसार, SIR प्रक्रिया ने यह साबित कर दिया है कि आदिवासी समुदाय को लगातार हाशिये पर धकेला जा रहा है। उनकीजनगणना, उनकी उपस्थिति, उनके वोट, उनकी पहचान—हर स्तर पर उनकी अनदेखी की जा रही है। उन्होंने कहा कि यह केवल वोटर लिस्ट कामामला नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में आदिवासी समाज की भागीदारी और उनके संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है। उन्होंने सरकार से SIR प्रक्रिया को दोबारा और न्यायपूर्ण तरीके से करने की मांग की और कहा कि आदिवासियों को इस तरह सिस्टम से बाहर करने की कोई भी कोशिशलोकतंत्र के लिए खतरा है।