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28 फरवरी की सुबह जब अमेरिका ने ईरान पर ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू किया था, तो व्हाइट हाउस में यकीन था कि यह जंग कुछ दिनों तक चलेगी जरूर, लेकिन इसमें रणनीति वेनेजुएला जैसा होगी- तेज, साफ और निर्णायक। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भरोसा था कि ईरान झुक जाएगा, लेकिन छह हफ्ते और 13,000 से ज्यादा हमलों को झेलने के बाद तस्वीर अलग नजर आई। ईरान ने न सिर्फ मिसाइलें दागना जारी रखा, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य को अपनी मुट्ठी में कसे रखा। आखिरकार वह हुआ, जो किसी ने नहीं सोचा था। ट्रंप ने सर्वनाश की धमकी वापस ली और 14 दिन का संघर्षविराम स्वीकार कर लिया।

ईरान को बातचीत की मेज तक लाने में मदद
यही इस पूरे युद्ध का सबसे नाटकीय मोड़ है। राष्ट्रपति ट्रंप ने एक ही दिन के दौरान ईरान को सर्वनाश की धमकी देने से लेकर यह घोषणा करने तक का सफर तय किया कि ईरान के नेतृत्व ने एक ‘काम करने लायक’ प्रस्ताव पेश किया है। ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य न खोलने पर ईरान के बिजली संयंत्रों और बुनियादी ढांचे को तबाह करने की जो धमकी दी थी, वह अपनी समयसीमा से करीब 90 मिनट पहले ही वापस ले ली। नतीजा यह हुआ कि अमेरिका, ईरान और इस्राइल ने बुधवार को 14 दिन के संघर्षविराम पर सहमति जताई। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर घोषणा करते हुए लिखा- हमने अपने सभी सैन्य उद्देश्य पूरे कर लिए हैं और ईरान के साथ दीर्घकालिक शांति के लिए एक निर्णायक समझौते के बहुत करीब हैं।
नहीं। पाकिस्तान खुद की पीठ थपथपा रहा है, लेकिन हकीकत कुछ और है। यह संघर्षविराम सिर्फ पाकिस्तान की कोशिशों का नतीजा नहीं था। मध्यस्थता में पाकिस्तान और चीन, दोनों शामिल थे। न्यूज एजेंसी AP को दो अधिकारियों ने बताया कि चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वह अमेरिका का सबसे बड़ा आर्थिक प्रतिस्पर्धी भी है। चीन ने ही खामोशी से संघर्षविराम की राह निकालने की रूपरेखा तय की। AFP के अनुसार, चीन ने ही ईरान को बातचीत की मेज तक लाने में मदद की।

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