केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने 64 करोड़ रुपये के बोफोर्स रिश्वत कांड के संबंध में अमेरिका को एक लेटर ऑफ रोगेटरी (LR) भेजा है। इस पत्र में निजीजांचकर्ता माइकल हर्शमैन से इस मामले में जानकारी मांगी गई है। अधिकारियों के मुताबिक, आधिकारिक चैनलों के माध्यम से जानकारी प्राप्त करनेके कई असफल प्रयासों के बाद फरवरी 2025 में यह अनुरोध भेजा गया।
कौन हैं माइकल हर्शमैन और उनकी भूमिका?
Fairfax Group के प्रमुख माइकल हर्शमैन ने 2017 में भारत का दौरा किया था और आरोप लगाया था कि कांग्रेस सरकार ने बोफोर्स मामले कीजांच को प्रभावित किया था। उन्होंने दावा किया कि उन्हें 1986 में भारत के वित्त मंत्रालय द्वारा मुद्रा नियंत्रण कानूनों के उल्लंघन और मनी लॉन्ड्रिंगमामलों की जांच के लिए नियुक्त किया गया था। इनमें कुछ मामले बोफोर्स सौदे से भी जुड़े थे। उन्होंने भारतीय एजेंसियों के साथ अपनी जानकारीसाझा करने की भी इच्छा जताई थी।
इंटरपोल के जरिए भी की गई अपील
CBI ने हर्शमैन की भूमिका से जुड़े दस्तावेजों के लिए भारत के वित्त मंत्रालय से अनुरोध किया था, लेकिन मंत्रालय ने यह कहते हुए जवाब दिया किउनके पास इस मामले से जुड़े कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। इसके बाद, 2023 और 2024 में अमेरिकी अधिकारियों को कई अनुरोध भेजे गए, साथही इंटरपोल के जरिए भी अपील की गई, लेकिन कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली।
जनवरी 2025 में गृह मंत्रालय और फरवरी में स्पेशल कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद, CBI ने अमेरिकी अधिकारियों को औपचारिक रूप से LR अनुरोध भेजकर मामले में आगे बढ़ने का फैसला किया।
क्या है बोफोर्स घोटाला?
बोफोर्स मामला 1986-87 का एक बड़ा रक्षा घोटाला है, जिसमें स्वीडिश हथियार निर्माता AB बोफोर्स द्वारा भारतीय सेना को 400 हॉवित्जर तोपोंकी आपूर्ति के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को रिश्वत देने के आरोप लगे थे। यह घोटाला तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधीसरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट बन गया था और कई वर्षों से बहस का विषय बना हुआ है।
स्वीडिश रेडियो चैनल द्वारा रिश्वतखोरी के आरोपों की पहली रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद 1990 में CBI ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की।1999 और 2000 में आरोपपत्र दायर किए गए, लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने 2005 में सबूतों की कमी का हवाला देते हुए सभी आरोपों को खारिजकर दिया।
CBI की जांच की मौजूदा स्थिति
CBI ने 2018 में इस फैसले को चुनौती दी थी, लेकिन देरी के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी। हालांकि, 2005 में एडवोकेट अजयअग्रवाल द्वारा दायर एक लंबित अपील में CBI को अपनी चिंताओं को रखने की अनुमति दी गई थी। अब, अमेरिकी जांचकर्ता माइकल हर्शमैन सेजानकारी प्राप्त करने के लिए भेजे गए लेटर ऑफ रोगेटरी के जरिए CBI इस मामले को फिर से आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है।