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कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एक बार फिर केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा किजब 2015 में पीएम मोदी ने संसद में मनरेगा का मज़ाक उड़ाया था, तभी उनकी संवेदनहीनता और दूरदर्शिता की कमी दिख गई थी। लेकिन महामारीके वक्त इसी मनरेगा ने करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बचाई।

रमेश ने बताया कि 2019-20 में जहां 6.16 करोड़ परिवारों ने इस योजना के तहत काम मांगा, वहीं कोविड के दौरान 2020-21 में यह आंकड़ा8.55 करोड़ पहुंच गया। उन्होंने कहा, “लॉकडाउन में जब सरकार के पास कोई योजना नहीं थी, तब मनरेगा ही था जिसने देश के सबसे ज़रूरतमंदलोगों को सहारा दिया।”

रिपोर्ट के ज़रिए खोली सरकार की पोल
LibTech India की ताज़ा रिपोर्ट का हवाला देते हुए रमेश ने बताया कि आज हालात बेहद खराब हैं। सिर्फ 7% परिवारों को ही साल में 100 दिनका काम मिल रहा है। ऊपर से प्रति परिवार औसत कार्यदिवस भी घट गया है। सरकार ने मनरेगा के लिए ₹86,000 करोड़ का बजट तय किया है, जोज़मीन पर ज़रूरत के मुकाबले बहुत कम है। जबकि स्वतंत्र विशेषज्ञों और PAEG जैसे संगठनों ने 2022-23 के लिए ₹2.64 लाख करोड़ कीसिफारिश की थी।

उन्होंने कहा, “विश्व बैंक भी कह चुका है कि योजना के लिए GDP का कम से कम 1.7% देना चाहिए, जबकि सरकार महज 0.26% दे रही है।”

जनता की सुनवाई नहीं, समस्याएं जस की तस
रमेश ने बताया कि कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान झारखंड के गढ़वा में 14 फरवरी 2024 को मनरेगा से जुड़े मज़दूरों ने अपनीपरेशानियां खुलकर रखी थीं। लेकिन 15 महीने बाद भी कुछ नहीं बदला। “ये सरकार की तरफ से बनाई गई एक बड़ी मानवीय और आर्थिक त्रासदीहै,” उन्होंने कहा।

कांग्रेस की 6 बड़ी मांगें
योजना को फिर से मांग आधारित बनाया जाए और काम मांगने वालों को पर्याप्त दिन मिले। मनरेगा मज़दूरी बढ़ाकर ₹400 प्रतिदिन की जाए।मज़दूरी दर तय करने के लिए स्वतंत्र समिति बनाई जाए। आधार आधारित भुगतान प्रणाली को अनिवार्य न बनाया जाए।,मज़दूरी समय पर मिले औरदेरी पर मुआवज़ा भी दिया जाए।, सालाना कार्यदिवस की सीमा 100 से बढ़ाकर 150 दिन की जाए।



जयराम रमेश का कहना है कि कांग्रेस का ये रुख सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि ज़मीनी समस्याओं के समाधान की दिशा में गंभीर पहल है।

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