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भारत की शिक्षा व्यवस्था को एक और गंभीर झटका लगा है केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा सोमवार को जारी किए गए नए नोटिफिकेशन नियमों से यह साफ हो गया है कि सरकार शिक्षा के क्षेत्र को पूरी तरह से उद्योगपतियों और राजनीतिक कनेक्शनों के हाथों में सौंपने जा रही है। इस फैसले के तहत, अब उन लोगों को कुलपति के पद के लिए योग्य ठहराया जा सकता है, जिनका शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। यह शिक्षा क्षेत्र में सुधार है, नहीं बल्कि यह एक खतरनाक शैक्षिक भ्रष्टाचार का प्रयास है।

नए मसौदा नियमों में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब उद्योग, सार्वजनिक नीति, और सार्वजनिक उपक्रमों में दस साल का अनुभव रखने वाले लोग सीधे कुलपति के रूप में नियुक्त किए जा सकते हैं। क्या यह पागलपन नहीं है? अब हम शैक्षणिक संस्थानों का नेतृत्व उन लोगों को सौंपने जा रहे हैं, जिनका शिक्षा से कोई वास्ता नहीं है। अब ऐसे लोग, जो कभी एक शिक्षक नहीं रहे, हमारे छात्रों के भविष्य को तय करेंगे। यह नियम शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर डालेंगे।

कुलपतियों का चयन अब एक छोटे से पैनल द्वारा होगा, जिसमें केवल विजिटर या चांसलर, यूजीसी और विश्वविद्यालय के उच्च पदस्थ लोग शामिल होंगे। यह बदलाव न केवल पारदर्शिता को खत्म करेगा, बल्कि विश्वविद्यालयों में भ्रष्टाचार और पक्षपाती नियुक्तियों के द्वार भी खोल देगा। अब हम क्या चाहते हैं – एक मजबूत शिक्षा प्रणाली या एक सरकार-प्रायोजित गुटबाजी का खेल?

सिर्फ कुलपति ही नहीं, सहायक प्रोफेसर के पद भी अब ऐसे लोगों के लिए खुले होंगे जिनके पास शैक्षणिक योग्यता की कोई गारंटी नहीं है। अगर आप 55% अंकों के साथ एमई या एमटेक कर चुके हैं, तो अब आपको यूजीसी-नेट की जरूरत नहीं। यह नियम शिक्षा के स्तर को गिराने का प्रयास है। हम उस व्यक्ति को शिक्षक बना रहे हैं, जो केवल डिग्री धारक है, लेकिन उसमें शैक्षिक सोच और गुणवत्ता की कोई समझ नहीं है.

मास्टर डिग्री के साथ 55% अंक हासिल करने वाले लोग सहायक प्रोफेसर के पद के लिए सीधे पात्र होंगे, बिना किसी शैक्षणिक परीक्षा या योग्यता के। क्या यह शिक्षा के प्रति एक शर्मनाक मजाक नहीं है? इस कदम से हम न केवल शिक्षा के स्तर को घटा रहे हैं, बल्कि हमारे छात्रों का भविष्य भी खतरे में डाल रहे हैं। क्या हम चाहते हैं कि ऐसे लोग हमारे बच्चों को पढ़ाएं, जिनके पास शिक्षा का कोई अनुभव नहीं है.

और इन बदलावों का सबसे बड़ा झटका यह है कि अब यह भी प्रस्तावित किया गया है कि शोध प्रकाशित करने या अकादमिक कार्य करने की आवश्यकता खत्म कर दी जाएगी। इससे न केवल शिक्षा की गुणवत्ता घटेगी, बल्कि यह हमारे शोध संस्थानों की ताकत को भी कमजोर करेगा। क्या हम चाहते हैं कि शिक्षा केवल पंखों की चमक के लिए रह जाए, न कि ज्ञान और शोध के लिए?

इन नए नियमों के तहत, यह सरकार सिर्फ एक बात साबित करना चाहती है – कि शिक्षा अब उनकी सत्ता का खेल बन गई है। क्या हम अब उद्योगपतियों और सत्ता के धन्नासेठों को शिक्षा का ठेका देने जा रहे हैं? क्या सरकार की यह कोशिश छात्रों की शैक्षिक यात्रा को एक व्यवसाय में बदलने की नहीं है.

भारत में शिक्षा का इतिहास और उसे चलाने का तरीका पूरी तरह से बदलने का यह प्रयास केवल हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है। इस बेकार कदम को चुपचाप स्वीकार कर लेंगे, या फिर इस पर खुलकर सवाल उठाएंगे? यह समय है हमारे अस्तित्व की रक्षा करने का, शिक्षा को केवल एक व्यापारिक टूल बनने से बचाने का।

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