कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 के खिलाफ विभिन्न जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा 3 फरवरी 2025 को जारी किए गए अंतरिम आदेश का स्वागत किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह अधिनियम सरकार ने जबरदस्ती संसद के माध्यम से लागू कियाथा, जिससे प्राकृतिक वनों को खतरा उत्पन्न हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और राज्यों को दिए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख 4 मार्च 2025 निर्धारित की है और इस दौरान उसने भारत सरकार और राज्य सरकारों को कोईभी ऐसा कदम उठाने से रोका है, जिससे वन भूमि में कमी आए। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जब तक किसी अन्य स्थान पर वनीकरण (वन तैयार करने) के लिए भूमि प्रदान नहीं की जाती, तब तक कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता।
जयराम रमेश का बयान: वनीकरण प्राकृतिक वनों के नुकसान का विकल्प नहीं
जयराम रमेश ने इस मुद्दे को और भी बुनियादी बताया। उनका कहना था कि वनीकरण केवल एक अस्थायी समाधान है और जैव विविधता से भरेप्राकृतिक वनों के नुकसान का कोई स्थायी विकल्प नहीं है। उन्होंने इसे “आसान रास्ता” करार दिया, लेकिन कहा कि इसे केवल आखिरी उपाय के रूपमें ही अपनाया जाना चाहिए। रमेश का मानना था कि प्राकृतिक वनों की रक्षा करना और उनका संरक्षण करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
7 अगस्त 2023 का जयराम रमेश का बयान
जयराम रमेश ने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने 7 अगस्त 2023 को इसी तरह के एक बयान में इस अधिनियम की जबरदस्ती को विनाशकारी बतायाथा। उनका कहना था कि सरकार ने यह अधिनियम लागू कर प्राकृतिक वनों के संरक्षण को खतरे में डाल दिया है, और उनका मानना है कि इसकादूरगामी प्रभाव पर्यावरण और जैव विविधता पर पड़ेगा।