उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने दिल्ली विश्वविद्यालय में ‘कर्तव्यम’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संविधान और लोकतंत्र को लेकर महत्वपूर्ण विचाररखे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि संविधान को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं होना चाहिए और इसका अंतिम स्वरूप केवल निर्वाचितप्रतिनिधियों द्वारा ही तय किया जाएगा। उनके अनुसार, संसद देश की सर्वोच्च संस्था है और इससे ऊपर कोई भी प्राधिकरण नहीं हो सकता। उन्होंनेयह भी कहा कि संवैधानिक पदों की प्रकृति औपचारिक या प्रतीकात्मक हो सकती है, लेकिन एक नागरिक लोकतंत्र में सर्वोच्च होता है और हर किसीकी अपनी भूमिका होती है।
धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के दो प्रमुख निर्णयों — गोलकनाथ और केशवानंद भारती मामलों का हवाला देते हुए संविधान की प्रस्तावना पर न्यायपालिकाकी असंगत व्याख्याओं पर सवाल उठाए। गोलकनाथ केस में संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन का अधिकार नहीं दिया गया था, जबकिकेशवानंद भारती केस में संसद को संविधान संशोधित करने की अनुमति दी गई, बशर्ते वह संविधान की मूल संरचना को प्रभावित न करे। उन्होंने कहाकि यह असंगति संविधान की व्याख्या को लेकर भ्रम पैदा करती है।
उन्होंने 25 जून 1975 को आपातकाल को लोकतंत्र का काला दिन बताते हुए कहा कि उस समय देश की सर्वोच्च अदालत ने नौ उच्च न्यायालयों कीसलाह की अवहेलना की थी और जनता के अधिकारों का हनन हुआ था। आपातकाल के दौरान लोगों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया औरबलिदान दिया, लेकिन कभी समझौता नहीं किया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र अभिव्यक्ति और संवाद से ही फलता-फूलता है और जबअभिव्यक्ति का गला घोंटा जाता है तो लोकतंत्र का अस्तित्व संकट में आ जाता है।
धनखड़ ने संविधान की मूल संरचना और उसमें निहित सिद्धांतों जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायिक समीक्षा और मौलिक अधिकारों पर भी प्रकाशडाला। उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारियों का होना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि42वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 51A के तहत मौलिक कर्तव्यों को संविधान में जोड़ा गया और 86वें संशोधन से शिक्षा को भी एक कर्तव्य केरूप में शामिल किया गया।
अंत में, उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमारा संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सभ्यता और मूल्यों का प्रतिनिधित्वकरता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि राष्ट्रवाद में कोई मिलावट नहीं होनी चाहिए और लोकतंत्र की गुणवत्ता निष्पक्ष व समावेशी संवाद से सुनिश्चितहोती है। यदि संवाद पर पैसे वालों या विदेशी हितों का प्रभाव हो, तो लोकतंत्र कमजोर पड़ जाता है। इसलिए पक्षपात से ऊपर उठकर निष्पक्षता कोअपनाना ही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।