केरल की स्वास्थ्य सेवाओं में आशा (Accredited Social Health Activist) कार्यकर्ताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ये महिलाएं ग्रामीणऔर शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने में अहम योगदान देती हैं। वे गर्भवती महिलाओं की देखभाल, नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य कीनिगरानी, टीकाकरण कार्यक्रमों को संचालित करने और महामारी के दौरान जागरूकता फैलाने जैसे कार्यों में सक्रिय रहती हैं। लेकिन सरकार कीअनदेखी और अपर्याप्त वेतन के कारण ये कर्मठ स्वास्थ्यकर्मी आज अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। कांग्रेस महासचिव प्रियंकागांधी वाड्रा ने उनके आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो महिलाएं हर घर और जरूरतमंद तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचा रहीहैं, वे खुद अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं।
आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार उनकी जरूरतों को नजरअंदाज कर रही है। वेतन वृद्धि, स्थायी कर्मचारी का दर्जा, स्वास्थ्य बीमा औरसुरक्षित कार्यस्थल जैसी उनकी मांगें लंबे समय से लंबित हैं। वर्तमान में उन्हें बेहद कम मानदेय मिलता है, जो जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं है। वेचाहती हैं कि उन्हें सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए ताकि वे सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ उठा सकें। इसके अलावा, स्वास्थ्य सेवाओं मेंकाम करने के बावजूद उन्हें खुद अपनी चिकित्सा सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। साथ ही, कई बार दूरदराज के क्षेत्रों में काम करने के दौरानउन्हें असुरक्षा और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है।
हालांकि केरल सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की कई घोषणाएं की हैं, लेकिन आशा कार्यकर्ताओं की मांगों को अब तक पूरी तरह स्वीकार नहींकिया गया है। वे आरोप लगाती हैं कि सरकार केवल आश्वासन देती आ रही है, जबकि उनकी परिस्थितियों में कोई वास्तविक सुधार नहीं हुआ है।कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरा देश स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा था, तब आशा कार्यकर्ताओं ने सबसे आगे रहकर अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने घर-घर जाकर लोगों की जांच की, संक्रमित मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में मदद की और टीकाकरण कार्यक्रमों को सफल बनाने में योगदान दिया। इसकेबावजूद, उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय बनी हुई है, और वे खुद को उपेक्षित महसूस कर रही हैं।
प्रियंका गांधी वाड्रा ने आशा कार्यकर्ताओं के संघर्ष को लेकर सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि ये महिलाएं निःस्वार्थ भाव से जनता की सेवाकर रही हैं, लेकिन सरकार उन्हें वह सम्मान और अधिकार नहीं दे रही, जिसकी वे हकदार हैं। उन्होंने कहा, “हम अपनी आशा बहनों के साथ खड़े हैं औरउनके बलिदानों, साहस और समर्पण को पूरा सम्मान देते हैं।” यह समस्या केवल केरल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में आशा कार्यकर्ताओं कोकम वेतन, अस्थायी रोजगार और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। कई राज्यों में इन कर्मियों ने अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किए हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस बदलाव देखने को नहीं मिला है। केंद्र और राज्य सरकारों को इस दिशा में प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है ताकि येस्वास्थ्य कर्मी अपनी जिम्मेदारियों को बिना किसी चिंता के निभा सकें।
सरकार को चाहिए कि वह आशा कार्यकर्ताओं के वेतन में वृद्धि करे, उन्हें न्यूनतम वेतन का लाभ दे, सरकारी कर्मचारी का दर्जा प्रदान करे और उनकेलिए स्वास्थ्य बीमा एवं अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करे। इसके अलावा, उनके कार्यस्थल की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।आशा कार्यकर्ताओं का यह आंदोलन सरकार के लिए एक चेतावनी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द विचार नहीं किया गया, तो यह विरोध और बड़ेस्तर पर हो सकता है।
केरल, जो अपनी उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जाना जाता है, वहां इस तरह की लापरवाही चिंता का विषय है। आशा कार्यकर्ता केवल स्वास्थ्यसेवाओं की रीढ़ नहीं हैं, बल्कि वे समाज के हर तबके तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने का अभिन्न हिस्सा भी हैं। वे दिन-रात मेहनत करके जनता की सेवाकर रही हैं, इसलिए उन्हें उनका उचित हक मिलना ही चाहिए।