मुकेश चंद्राकर का नाम आज छत्तीसगढ़ के बीजापुर में एक साहसी पत्रकार और सत्य के लिए संघर्ष करने वाले शख्स के रूप में लिया जाता है। उनका जीवन संघर्षों से भरा हुआ था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपनी मेहनत और ईमानदारी से वह एक मिसाल बने। उनका निधन न केवल पत्रकारिता की दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है, बल्कि यह भी एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या हम अपने उन बहादुर पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहे हैं, जो जनता की आवाज़ उठाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं।
जीवन की कठिन शुरुआत
मुकेश चंद्राकर का जीवन बहुत ही कठिन परिस्थितियों से शुरू हुआ था। वे 2005 में सलवा जुडूम के दौरान विस्थापित हुए थे, जब वे और उनका परिवार पहले आवापल्ली फिर बीजापुर आ गए थे। उनका बचपन रिफ्यूजी कैंपों में बीता, जहां उन्हें न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। मुकेश कहते थे कि उस समय उन्होंने टेंट में रहकर अपनी ज़िंदगी को संघर्षपूर्ण तरीके से जीने की शुरुआत की। बीजापुर आने के बाद भी उन्होंने कई संघर्षों का सामना किया। घर नहीं था, तो उन्होंने गैरेज में काम किया, जिससे परिवार का पालन पोषण हो सके।
उनकी ज़िंदगी में शिक्षा एक बड़ा संघर्ष बनकर सामने आई थी, लेकिन मुकेश ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने मुश्किल हालात में भी अपनी पढ़ाई जारी रखी और एक दिन पत्रकारिता में करियर बनाने का संकल्प लिया। मुकेश का सपना था कि वे अपनी लेखनी के ज़रिए अपने इलाके की सच्चाई दुनिया तक पहुंचा सकें।
पत्रकारिता का सफर
मुकेश चंद्राकर ने पत्रकारिता की शुरुआत न्यूज 18 से की थी। हालांकि, वे जल्दी ही यह महसूस करने लगे कि बड़े मीडिया चैनल्स पर बस्तर और आसपास के इलाकों की खबरों को उतनी तवज्जो नहीं दी जाती, जितनी दी जानी चाहिए। इस कारण उन्होंने खुद का यूट्यूब चैनल “बस्तर जंक्शन” शुरू किया। मुकेश का मानना था कि बस्तर और बीजापुर जैसे इलाकों में स्थानीय पत्रकारों को सच्चाई सामने लाने के लिए एक मंच की जरूरत है, और यही वजह थी कि उन्होंने अपने चैनल के माध्यम से बस्तर की आवाज़ को उठाने की कोशिश की।
“बस्तर जंक्शन” को उन्होंने अकेले ही डेढ़ लाख से अधिक सब्सक्राइबर तक पहुंचाया। शुरुआत में मोबाइल फोन से एडिटिंग करने वाले मुकेश ने धीरे-धीरे लैपटॉप का इस्तेमाल करना शुरू किया। उनका उद्देश्य सिर्फ खबरों का प्रसारण करना नहीं था, बल्कि वह चाहते थे कि बस्तर के लोग खुद अपनी कहानी दुनिया के सामने रखें।
मुकेश का मानना था कि जब तक वह खुद अपनी रिपोर्टिंग नहीं करेंगे, तब तक सच्चाई कभी पूरी तरह से सामने नहीं आएगी। इस तरह उन्होंने अपनी रिपोर्टिंग की दिशा को हमेशा नए तरीके से देखा और दूसरों से अलग जाकर काम किया। एक बार उन्होंने अपने दोस्त थमीर कश्यप से कहा था, “न्यूज चैनल्स अक्सर हमारे इलाके की खबरों को या तो नज़रअंदाज़ कर देते हैं, या फिर खबरों को काटकर प्रसारित करते हैं।”
प्रशासन से टकराव और सत्य के लिए संघर्ष
मुकेश चंद्राकर की रिपोर्टिंग कभी भी आसान नहीं रही। उन्होंने अपनी पत्रकारिता के दौरान कई बार प्रशासन और सरकार से टकराव किया। एक बार उन्होंने सिलगेर आंदोलन के बारे में ट्विटर पर पोस्ट किया, जिसे लेकर प्रशासन ने उन पर दबाव डाला। हालांकि, मुकेश ने अपना रुख नहीं बदला और पोस्ट को डिलीट नहीं किया। उनका मानना था कि रिपोर्टिंग का उद्देश्य सच्चाई को सामने लाना है, न कि दबाव में आकर सच को छुपाना।
बीजापुर के धुरंधर पत्रकार के रूप में मुकेश ने हमेशा वहां के आदिवासी इलाकों में हो रही घटनाओं और संघर्षों को प्रमुखता से कवर किया। बासागुड़ा जैसे इलाकों में जहां 10वीं कक्षा पास करना भी बड़ी बात होती है, मुकेश ने पत्रकारिता में अपनी मेहनत से ऊंचे मुकाम हासिल किए।
रावघाट परियोजना में भ्रष्टाचार का पर्दाफाश
मुकेश चंद्राकर ने एक बार रावघाट परियोजना पर रिपोर्टिंग की, जिसमें भ्रष्टाचार की बड़ी कहानी सामने आई थी। इस रिपोर्ट के दौरान मुकेश पर हमले भी हुए। उनकी कार पर हमला किया गया और उनकी जान को भी खतरा पैदा किया गया। इस हमले के बावजूद मुकेश ने अपनी रिपोर्टिंग को जारी रखा और प्रशासन से इसकी शिकायत करने के लिए SP ऑफिस गए। लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।
मुकेश ने सड़क निर्माण के भ्रष्टाचार का खुलासा किया था, जो सरकार के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गया था। उनके काम की गंभीरता और सरकार के खिलाफ उठाए गए सवालों से सरकार को कभी भी उनका काम सहज नहीं लगा था।
नक्सलियों से भिड़ते हुए सीआरपीएफ जवान की मदद
मुकेश चंद्राकर ने नक्सलियों द्वारा अपहृत एक सीआरपीएफ जवान को छुड़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके इस साहसिक कार्य से यह साबित हुआ कि मुकेश सिर्फ पत्रकार ही नहीं, बल्कि लोगों के असली हीरो थे।
मुकेश का यह व्यक्तित्व और कार्यक्षेत्र सिर्फ पत्रकारिता तक सीमित नहीं था। वह हमेशा अपने लोगों के लिए खड़े होते थे, चाहे वह नक्सलवादियों से लड़ाई हो या फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाना।
मौत की साजिश
मुकेश चंद्राकर की जिंदगी का अंत दुखद तरीके से हुआ। उनकी हत्या 2021 में कर दी गई। उनके शव को सेप्टिक टैंक में डालकर प्लास्टर से ढक दिया गया। उनकी हत्या की वजह ठेकेदार सुरेश चंद्राकर द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के खुलासे को माना गया, जिसे मुकेश ने अपनी रिपोर्ट में उजागर किया था। सुरेश चंद्राकर ने मिरतुर से गंगालूर तक सड़क बनाने का ठेका लिया था, लेकिन सड़क अधूरी होने के बावजूद प्रशासन ने 90% से अधिक भुगतान कर दिया था। इस मामले को उजागर करने के बाद सुरेश चंद्राकर ने मुकेश को अपनी राह से हटा दिया।
पुलिस जांच और गिरफ्तारी
मुकेश चंद्राकर के गायब होने के बाद उनके भाई यूकेश चंद्राकर ने पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पुलिस ने ईमेल आईडी के आधार पर लोकेशन ट्रेस किया, जो ठेकेदार सुरेश चंद्राकर के बैडमिंटन कोर्ट के पास था। इसके बाद पुलिस ने सेप्टिक टैंक पर शक किया और वहां मुकेश का शव बरामद किया। पुलिस ने मुख्य आरोपी रितेश चंद्राकर और उसके दो साथियों को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, सुरेश चंद्राकर की गिरफ्तारी भी जल्द होने की उम्मीद है।
अंतिम शब्द:
पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या न केवल बस्तर बल्कि पूरे देश के पत्रकारों के लिए एक बड़ा झटका है। इस घटना ने पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन इस मामले में किस प्रकार की कार्रवाई करते हैं और क्या पत्रकारों के सुरक्षा इंतजामों में सुधार किया जाएगा। इन उठते सवालों का जवाब प्रदेश सरकार को देना होगा।
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