दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने समाज में महिलाओं की स्थिति पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा किमहिलाओं को केवल पूजा का प्रतीक मानने के बजाय वास्तविक सम्मान देना जरूरी है। न्यायमूर्ति उपाध्याय ने जोर देकर कहा कि जब तक समाज मेंमहिला सम्मान और समानता को व्यवहार में नहीं उतारा जाता, तब तक जेंडर इक्वालिटी (लैंगिक समानता) अधूरी ही रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कियह सिर्फ सरकार की नीतियों या कानूनों से हल होने वाली समस्या नहीं है, बल्कि पूरे समाज के माइंडसेट (सोच) में बदलाव लाने की जरूरत है। जबतक हम अपने रोजमर्रा के व्यवहार में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं देंगे, तब तक केवल देवी पूजा या नारेबाजी से कोई फायदा नहीं होगा।
दिल्ली हाईकोर्ट में एक कानूनी कार्यक्रम के दौरान न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने कहा कि भारतीय संस्कृति में हमेशा से महिलाओं को देवी के रूपमें पूजा जाता रहा है। हालांकि, वास्तविकता में उन्हें समान अधिकार और सम्मान नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि भारत में कई कानून बनाए गए हैं, लेकिन सिर्फ कानूनों के सहारे महिला सशक्तिकरण नहीं किया जा सकता। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों, कार्यस्थलों पर भेदभाव औरघरेलू हिंसा का जिक्र करते हुए कहा कि इन समस्याओं को जड़ से खत्म करने के लिए समाज को अपनी मानसिकता बदलनी होगी। उन्होंने कहा किसरकारें और अदालतें अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं, लेकिन अगर आम लोग अपने परिवार और कार्यस्थलों में महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहारनहीं रखते, तो बदलाव लाना मुश्किल होगा।
जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि भारत जैसे तेजी से विकसित होते देश में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना अनिवार्य है। अगर महिलाओं को समान अवसरनहीं दिए जाएंगे, तो देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति अधूरी रह जाएगी। उन्होंने कहा कि महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवनमें पुरुषों के समान अवसर दिए जाने चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि लड़कियों को समान शिक्षा मिले, कार्यस्थलों पर भेदभाव और यौन उत्पीड़नखत्म किया जाए, महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता पर जोर दिया जाए और गृहणियों के योगदान को भी आर्थिक रूप से पहचाना जाए।
इसके अलावा, उन्होंने सोशल मीडिया और फिल्मों में महिलाओं की छवि पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि मीडिया और मनोरंजन जगत को भीमहिलाओं को केवल ‘ऑब्जेक्ट’ के रूप में दिखाने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए और सकारात्मक रोल मॉडल को बढ़ावा देना चाहिए।
भारत में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई कानून बनाए गए हैं, लेकिन उनका सही क्रियान्वयन (Implementation) अब भी एक चुनौती है।जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि रेप और यौन शोषण के मामलों में त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाना चाहिए, घरेलू हिंसा के मामलों को गंभीरता सेलिया जाए और महिलाओं के कार्यस्थलों पर सुरक्षित माहौल सुनिश्चित किया जाए। जब तक कानूनों को सही तरीके से लागू नहीं किया जाएगा, तबतक महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर रोक लगाना मुश्किल होगा।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि महिलाओं को राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, और व्यापार जैसे हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के समान अवसर दिए जानेचाहिए। उन्होंने कहा कि महिलाओं को सिर्फ घर और परिवार तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उनकी प्रतिभा का पूरा उपयोग करनाचाहिए। जिन देशों ने महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया है, वहां की अर्थव्यवस्था और समाज अधिक विकसित हुआ है। भारत को भी यह सीखनाचाहिए और महिला सशक्तिकरण को प्राथमिकता देनी चाहिए।
जस्टिस उपाध्याय ने अपने भाषण के अंत में कहा कि महिलाओं का सम्मान किसी कानून या नियम से नहीं, बल्कि सोच बदलने से ही संभव होगा।उन्होंने कहा कि समाज को यह समझना होगा कि महिलाएं केवल पूजनीय नहीं, बल्कि समान अधिकारों की हकदार हैं। हमें अपनी सोच बदलनी होगीऔर महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार को अपनी संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा। केवल तभी सच्चे अर्थों में महिला समानताऔर सशक्तिकरण संभव होगा।