
देश की राजनीति इन दिनों एक गंभीर संवैधानिक बहस से गुजर रही है। यह बहस केवल किसी एक नेता या दल के बारे में नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्रकी सेहत और भविष्य को लेकर है। हाल ही में उच्च न्यायपालिका के एक न्यायाधीश को लेकर संसद में पेश किए गए प्रस्ताव और उस पर सरकार कीप्रतिक्रिया ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
संवैधानिक प्रक्रिया से छेड़छाड़ का आरोप
21 जुलाई 2025 को कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने राज्यसभा में एक महत्वपूर्ण और संवैधानिक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें न्यायमूर्ति यशवंत वर्माके व्यवहार और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उनके विरुद्ध जांच समिति गठित करने की मांग की गई थी। इस प्रस्ताव पर 63 राज्यसभा सांसदोंके हस्ताक्षर थे, वहीं लोकसभा में इसी प्रकार के प्रस्ताव पर 152 सांसदों के हस्ताक्षर थे।
सभापति का बयान और मंत्री की स्वीकृति
उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ जी ने स्वयं सदन में कहा कि उनके पास राज्यसभा के 50 से अधिक सांसदों द्वाराहस्ताक्षरित प्रस्ताव आया है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह संख्या नियमों के अनुसार पर्याप्त है। उन्होंने सचिव को यह निर्देश भी दिया कि यह जांचाजाए कि क्या लोकसभा में भी इसी दिन ऐसा ही प्रस्ताव लाया गया है। इस बीच, जब उन्होंने औपचारिक रूप से कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल सेयह पूछा कि क्या लोकसभा में यह प्रस्ताव लाया गया है, तो मंत्री ने ‘हां’ में उत्तर दिया।
फिर भी क्यों नहीं बनी जांच समिति?
अब सवाल यह उठता है कि जब दोनों सदनों में प्रस्ताव लाया गया था, और सभी संवैधानिक औपचारिकताएं पूरी की गई थीं, तो फिर न्यायिक जांचसमिति का गठन क्यों नहीं किया गया? क्या सरकार ने जानबूझकर संवैधानिक प्रक्रिया में कोई खामी छोड़ी ताकि यह मामला अदालत में जाकरखारिज हो सके?
संविधान के साथ खिलवाड़ या राजनीतिक चालबाज़ी?
इस पूरे मामले में एक बात साफ नजर आती है – सरकार की तरफ से बार-बार भ्रम की स्थिति पैदा की गई। पहले कहा गया कि प्रस्ताव मौजूद है, फिर यह कहा जाने लगा कि प्रस्ताव मान्य नहीं है। इसके बाद उपराष्ट्रपति धनखड़ जी का अचानक इस्तीफा और सरकार की चुप्पी ने लोगों को औरभी संदेह में डाल दिया।
कानून मंत्री और सरकार की भूमिका पर सवाल
अगर लोकसभा में प्रस्ताव नहीं लाया गया था, तो फिर मंत्री मेघवाल ने ‘हां’ क्यों कहा? और अगर प्रस्ताव लाया गया था, तो फिर उसे आगे बढ़ाने मेंदेरी क्यों हुई? इन सवालों से यह आभास होता है कि सरकार इस मुद्दे को लेकर या तो गंभीर नहीं थी या जानबूझकर इसे लटकाना चाहती थी।
भाजपा की असुरक्षा और राजनीति का चेहरा
यह पूरा प्रकरण एक तरफ मोदी सरकार की संवैधानिक प्रक्रिया से दूरी, न्यायपालिका पर दबाव और राजनीतिक असहिष्णुता को उजागर करता है, वहीं दूसरी ओर यह भी दिखाता है कि वर्तमान सरकार किस हद तक राजनीतिक लाभ के लिए संवैधानिक संस्थाओं को भी नजरअंदाज कर सकती है।
कांग्रेस और विपक्षी दलों द्वारा उठाया गया यह मुद्दा केवल एक न्यायाधीश के आचरण से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह देश के लोकतांत्रिक मूल्यों, न्यायव्यवस्था की स्वतंत्रता और सरकार की जवाबदेही से भी सीधा जुड़ा हुआ है।
यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार बार-बार संवैधानिक प्रक्रियाओं को अपनी सुविधा अनुसार मोड़ने की कोशिश करती रही है। न्यायपालिका को अपनेनियंत्रण में लेने का यह प्रयास न केवल लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, बल्कि आने वाले समय में इससे देश की संस्थाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। यहसमय है जब जनता को सतर्क होकर सरकार से जवाब मांगना चाहिए — ताकि संविधान और न्याय व्यवस्था सुरक्षित रह सके।