
कांग्रेस के मीडिया एवं प्रचार विभाग के अध्यक्ष पवन खेड़ा ने राजेश एक्सपोर्ट्स से जुड़े मामले को लेकर केंद्र सरकार और नियामक संस्थाओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सेबी की अंतरिम रिपोर्ट में सामने आई जानकारी भारत के कॉर्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े वित्तीय गड़बड़ी मामलों में से एक की ओर इशारा करती है। पवन खेड़ा का कहना है कि अगर रिपोर्ट में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक कंपनी की गलती नहीं बल्कि नियामक व्यवस्था की बड़ी विफलता भी मानी जाएगी।
क्या है पूरा मामला?
पवन खेड़ा ने बताया कि सेबी की जांच में यह बात सामने आई है कि वित्तीय वर्ष 2021 से 2025 के बीच राजेश एक्सपोर्ट्स द्वारा दिखाए गए कुल राजस्व (रेवेन्यू) में भारी अंतर पाया गया है। सेबी के अनुसार लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व को सही तरीके से सत्यापित नहीं किया जा सका। उनका कहना है कि कंपनी की विदेशी इकाइयों और सहायक कंपनियों से आने वाले राजस्व को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। जांच के दौरान कई जरूरी दस्तावेज और रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे संदेह और बढ़ गया।
सेबी की जांच में क्या सामने आया?
पवन खेड़ा ने कहा कि सेबी की जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं। जांच में पाया गया कि कंपनी के कुल राजस्व का बड़ा हिस्सा विदेशी सहायक कंपनियों से दिखाया गया था। विशेष रूप से स्विट्जरलैंड की वैलकैम्बी कंपनी को कंपनी के मुख्य कारोबार का आधार बताया गया, लेकिन उसके रिकॉर्ड और समूह के कुल राजस्व के आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि सेबी को कई लेन-देन से जुड़े दस्तावेज, ग्राहक विवरण, सप्लायर रिकॉर्ड, स्टॉक रिकॉर्ड और अन्य वित्तीय जानकारी पूरी तरह उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके अलावा कुछ निवेशों और बड़े वित्तीय लेन-देन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
राहुल गांधी की चेतावनी का किया जिक्र
पवन खेड़ा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बयानों का जिक्र करते हुए कहा कि राहुल गांधी लगातार देश में बढ़ते क्रोनी कैपिटलिज्म को लेकर चेतावनी देते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि राहुल गांधी का मानना रहा है कि देश की संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है और जवाबदेही की व्यवस्था को खत्म किया जा रहा है। पवन खेड़ा के अनुसार राजेश एक्सपोर्ट्स का मामला भी इसी तरह के मॉडल का एक उदाहरण दिखाई देता है, जहां आम निवेशकों के हितों की जगह कुछ बड़े कॉर्पोरेट समूहों को प्राथमिकता दी जाती है।
सरकार की नियामक व्यवस्था पर सवाल
पवन खेड़ा ने कहा कि केंद्र सरकार हमेशा दावा करती है कि भारत की नियामक व्यवस्था मजबूत और विश्वस्तरीय है। लेकिन जब इतने बड़े स्तर पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो सरकार को जवाब देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पहले भी कई मामलों में नियामक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल उठ चुके हैं। ऐसे में सरकार यह नहीं कह सकती कि सब कुछ ठीक चल रहा है।
छोटे निवेशकों को हुआ भारी नुकसान
पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि इस पूरे मामले का सबसे बड़ा नुकसान छोटे निवेशकों को हुआ है। उन्होंने कहा कि कंपनी के शेयर की कीमत में भारी गिरावट आई है, जिससे लाखों निवेशकों की पूंजी प्रभावित हुई। उन्होंने सवाल उठाया कि जब बड़े संस्थागत निवेशक समय रहते अपने निवेश निकालने में सफल हो गए, तो क्या उन्हें पहले से किसी संभावित खतरे की जानकारी थी? अगर ऐसा था, तो आम निवेशकों को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली?
सरकार से पूछे गए पांच बड़े सवाल
पवन खेड़ा ने केंद्र सरकार के सामने पांच महत्वपूर्ण सवाल रखे। पहला सवाल यह है कि यदि वास्तविक रिकॉर्ड और लेन-देन उपलब्ध नहीं थे, तो कंपनी कई वर्षों तक इतने बड़े राजस्व के आंकड़े कैसे दिखाती रही। दूसरा सवाल यह है कि सेबी के अलावा अन्य जांच एजेंसियों ने इस मामले में क्या भूमिका निभाई और उन्होंने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की। तीसरा सवाल यह है कि वर्षों से मौजूद चेतावनी संकेतों को पहले क्यों नहीं पहचाना गया और आम निवेशकों को नुकसान से बचाने के लिए कदम क्यों नहीं उठाए गए। चौथा सवाल यह है कि क्या सरकार को पहले से किसी शिकायत, व्हिसलब्लोअर सूचना या चेतावनी की जानकारी थी। यदि थी, तो उस पर क्या कार्रवाई की गई। पांचवां सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, वित्त मंत्री और वाणिज्य मंत्री इस मामले में जवाबदेही स्वीकार करेंगे।
संस्थाओं में भरोसा बनाए रखने की जरूरत
पवन खेड़ा ने कहा कि देश की आर्थिक व्यवस्था का आधार निवेशकों का विश्वास होता है। यदि निवेशकों का भरोसा कमजोर होता है, तो इसका असर पूरे वित्तीय तंत्र पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि देश को ऐसे नियामक संस्थानों की जरूरत है जो पूरी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और मजबूत हों। साथ ही किसी भी प्रकार की गड़बड़ी सामने आने पर समय रहते कार्रवाई करें।
देश को चाहिए जवाब
पवन खेड़ा ने कहा कि यह मामला केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है। यह देश की वित्तीय व्यवस्था, निवेशकों के विश्वास और नियामक संस्थाओं की कार्यप्रणाली से जुड़ा हुआ विषय है। उन्होंने मांग की कि पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो तथा यह स्पष्ट किया जाए कि क्या यह केवल कॉर्पोरेट स्तर की गड़बड़ी थी या फिर निगरानी व्यवस्था की कमजोरी के कारण यह स्थिति पैदा हुई। पवन खेड़ा ने कहा कि देश के करोड़ों निवेशक, शेयरधारक और आम नागरिक इस मामले में स्पष्ट जवाब चाहते हैं और सरकार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए।