
आनंद शर्मा ने भारत की विदेश नीति को लेकर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि आज जिस प्रकार विदेश नीति में दिशा भ्रम दिखाई दे रहा है, उससे भारत की साख और प्रभाव विश्व पटल पर कमजोर हुआ है। भारत जैसी महान परंपरा वाला देश, जिसने गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व कियाऔर पूरी दुनिया में नैतिकता तथा मानवता की आवाज़ के रूप में पहचाना गया, वह आज चुप है और दिशाहीन दिख रहा है।
भारत की नैतिक शक्ति थी सबसे बड़ी पूंजी
आनंद शर्मा ने कहा कि भारत की असली शक्ति उसकी नैतिकता और मानवता की आवाज़ थी। यही कारण था कि जब कोरिया संकट हुआ था याजब अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों में आज़ादी और रंगभेद के खिलाफ आंदोलन हो रहे थे, तब पूरी दुनिया ने भारत की ओर देखा औरभारत की बात सुनी। लेकिन आज यह स्थिति नहीं रही। उन्होंने कहा कि
आज भारत की नैतिक आवाज़ कमजोर हुई है। जो देश हमें एक मार्गदर्शक मानते थे, वे भी अब हैरान हैं कि भारत चुप क्यों है?
विदेश नीति पर देश में बने आम सहमति खत्म हो रही
शर्मा ने कहा कि भारत की विदेश नीति हमेशा राष्ट्रीय हित और आम सहमति के आधार पर बनी थी, लेकिन वर्तमान सरकार में यह परंपरा टूट रही है।संसद को जानकारी दिए बिना, विपक्षी दलों से चर्चा किए बिना, सरकार एकतरफा निर्णय ले रही है, जो देशहित में नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कहा किविदेश नीति पर कोई भी निर्णय केवल सत्ता में बैठे कुछ लोगों का नहीं होना चाहिए। यह विषय पूरे देश से जुड़ा है और इसमें व्यापक विचार-विमर्शजरूरी है।
गाज़ा पर भारत की चुप्पी दुखद
आनंद शर्मा ने गाज़ा में जारी संकट को लेकर भारत के रवैये पर भी नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा कि
12 जून को जब संयुक्त राष्ट्र महासभा में युद्धविराम और सहायता पहुंचाने के प्रस्ताव पर मतदान हुआ, तब 149 देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन भारत ने मतदान से दूर रहकर शर्मनाक चुप्पी साध ली। यह वही भारत है जिसे पूरी दुनिया गाँधीजी की धरती के रूप में जानती है। उन्होंने कहाकि जब पूरी दुनिया – यहाँ तक कि ब्रिक्स के सभी सदस्य, यूरोपीय देश और अमेरिका के मित्र देश भी मानवता के पक्ष में खड़े रहे, तब भारत क्यों नहींखड़ा हुआ?
वैश्विक दक्षिण में भारत की साख को लगा धक्का
शर्मा ने कहा कि भारत को वैश्विक दक्षिण का नेता माना जाता है, लेकिन इस एक निर्णय से भारत की साख को गहरी चोट पहुंची है। उन्होंने कहा, जबवैश्विक दक्षिण के सभी देश युद्धविराम के पक्ष में थे, तब उनका नेता यानी भारत चुप क्यों था? भारत की यह चुप्पी केवल निंदनीय नहीं, दुखद भी है।
सरकार को आत्ममंथन और सुधार की ज़रूरत
आनंद शर्मा ने सरकार को स्पष्ट शब्दों में सुझाव दिया कि अब समय है आत्ममंथन का, नीति पुनर्विचार का और ईमानदारी से अपनी विदेश नीति कापुनर्निर्धारण करने का। सरकार को विपक्षी दलों और देश के तमाम बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर विदेश नीति पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि,भारत को अपनी नैतिक स्थिति फिर से हासिल करनी होगी। जो देश हमारी तरफ देखते हैं, उनके लिए हमें फिर से उम्मीद कीकिरण बनना होगा।
आनंद शर्मा का यह वक्तव्य एक साफ संकेत है कि देश की विदेश नीति पर अब चुप नहीं बैठा जा सकता। भारत जैसे लोकतंत्र में विदेश नीति कोईगुप्त विषय नहीं होता, बल्कि यह राष्ट्रीय संवाद का हिस्सा होना चाहिए। अगर हम अपनी पारंपरिक भूमिका से हटते हैं, तो न सिर्फ हमारी वैश्विक छविको नुकसान होता है, बल्कि हमारे साझेदार देशों का भरोसा भी टूटता है।