सुप्रीम कोर्ट का स्वत: संज्ञान
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की उस टिप्पणी को असंवेदनशील करार दिया है, जिसमें बलात्कार पीड़िता को ही जिम्मेदार ठहराते हुए कहा गयाथा कि उसने “खुद ही मुसीबत को आमंत्रित किया।” न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने टिप्पणी को अनुचितबताया और न्यायिक पदों पर बैठे लोगों को बयान देते समय सावधानी बरतने की सलाह दी।
हाई कोर्ट का विवादास्पद बयान
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बलात्कार के एक आरोपी को जमानत देते हुए कहा था कि शिकायतकर्ता ने शराब के प्रभाव में आरोपी के घर जाकर खुद कोजोखिम में डाला, जिससे उसने “खुद ही परेशानी को न्योता दिया।” इस बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर आपत्ति जताई और दो टूक कहा कि ऐसेमामलों में जजों को शब्दों के चयन में अत्यधिक सतर्क रहना चाहिए।
कासगंज केस से जुड़ा है मामला
यह मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का है, जहां 12 जनवरी 2022 को एक महिला ने शिकायत दर्ज करवाई थी। उसके अनुसार, वह अपनी 14 वर्षीय बेटी के साथ घर लौट रही थी, तभी गांव के तीन युवकों ने उन्हें रोका और बेटी को जबरन बाइक पर बैठा लिया। रास्ते में तीनों आरोपियों नेउसके साथ यौन हमले का प्रयास किया, लेकिन शोर सुनकर ग्रामीणों के आने पर फरार हो गए।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराई संवेदनशीलता की जरूरत
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि “महिला ने खुद मुसीबत को न्योता दिया” जैसा बयान न केवल असंवेदनशील है, बल्कि यह पीड़िता कोदोषी ठहराने जैसा है। अदालत ने कहा कि न्यायालयों को निर्णय देते समय बेहद सोच-समझ कर टिप्पणी करनी चाहिए, क्योंकि उनका प्रभाव समाजपर गहरा पड़ता है।
पहले भी आया था ऐसा मामला
यह पहला मौका नहीं है जब इलाहाबाद हाई कोर्ट के किसी आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताई है। इससे पहले 17 मार्च को भी हाई कोर्ट कीएक टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया था, जिसमें छेड़छाड़ के एक मामले को दुष्कर्म के दायरे में न मानने की बात कही गई थी। उस आदेशपर भी सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी।